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*कचारगढ़ में महापूजा का समापन* *पारंपरिक समारोह में देश के 16 राज्यों के अलावा विदेश से पहुंचे श्रद्धालु*

*कचारगढ़ में महापूजा का समापन*

*पारंपरिक समारोह में देश के 16 राज्यों के अलावा विदेश से पहुंचे श्रद्धालु*

गोंदिया:  सालेकसा तहसील मुख्यालय से तहसील मुख्यालय से 15 किमी. दूर पूर्व में स्थित कचारगढ़ में बिखरी आदिवासी संस्कृति ने सभी का मन मोह लिया. पांच दिवसीय महापूजा का समापन 18 फरवरी को हुआ. कचारगढ़ में एशिया की सबसे बड़ी गुफा है. देश के 16 राज्यों के साथ ही विदेशों से लाखों श्रद्धालु हर वर्ष माघ में महापूजा के लिए आते हैं. कचारगढ़ को आदिवासी समाज की काशी माना जाता है .इस वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते यात्रा के बजाय 14 फरवरी से 18 फरवरी तक आयोजन किया गया. कचारगढ़ लोहायुग से ही आदिवासी समुदाय के लोगों का स्थान रहा है. आदिवासी समाज के लोगों का मानना है कि इस स्थल पर उनके पूर्वज रहते हैं . इस वजह से देश-विदेश के लाखों आदिवासी समाज बंधु अपने पूर्वजों को याद करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने हर वर्ष यहा आते हैं, यहां अपनी तमन्ना पूरी करते हैं. इस स्थल पर 5 दिनों तक जीस पूजा व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन किया जाता है. उसमें आदिवासी समाज की संस्कृति की झलक स्पष्ट देखी जा सकती है .पूजा के दौरान समाज को पारंपरिक वेशभूषा व आभूषण की झलक दिखाई देती है. कचारगढ़ में निकाली जाने वाली रैली में परंपरागत वेशभूषा के साथ ही हथियार सामग्री भी दिखाई देती है. जय प्री कुपारी लिगों के जयघोष से संपूर्ण परिसर उठता है.


*आदिवासी संस्कृति, भाषा, लोकगीतों ने मन मोहा*
सतरंगी ध्वजारोहण के साथ मां काली कंकाली के चंद्रपुर से आने वाली बग्गी के साथ ही यहां प्रतिदिन होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आदिवासी समाज की संस्कृति, भाषा, आभूषण, लोकगीत की झलक दिखाई देती है. यही वजह है कि आदिवासी समाज के साथ ही अन्य समाज के लोग भी संस्कृति को करीब से जानने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं.

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